` Nanda Devi Raj jat Yatra in Hindi – 12 वर्षों के बाद होती है, उत्तराखंड की नंदादेवी राजजात यात्रा

Nanda Devi Raj jat Yatra in Hindi – 12 वर्षों के बाद होती है, उत्तराखंड की नंदादेवी राजजात यात्रा

Nanda Devi Raj jat Yatra (नंदादेवी राजजात यात्रा)

नन्दादेवी राजजात यात्रा उत्तराखंड में प्रत्येक 12 वर्षों में होने वाली विश्व की अनोखी पदयात्रा है | इस यात्रा को गढ़वाल व कुमाऊँ के सांस्कृतिक एकता का प्रतीक माना जाता है | यह यात्रा चमोली के कांसुवा गाँव के पास स्थित नौटी के नंदादेवी मन्दिर से प्रारम्भ होकर होमकुण्ड में समाप्त होती है | 280 किलोमीटर की यह यात्रा 19-20 दिनों में सम्पूर्ण की जाती है | राजजात यात्रा प्रत्येक 12 वर्षों में चांदपुर गढ़ी के वंशज कांसुवा गाँव के राजकुंवरों के नेतृत्व में आयोजित की जाती है |


Nanda Devi Raj jat Yatra
नंदादेवी राजजात यात्रा

क्यों होती है नन्दा राजजात यात्रा ?

जैसा कि आप सभी जानते हैं कि माता पार्वती जी का विवाह कैलाश पति शंकर भगवान् से हुआ था | माता पार्वती मद्रांचल पर्वत की पुत्री थीं, इसलिए उत्तराखंड में रहने वाले सभी लोग पार्वती या नंदादेवी को अपनी विवाहित बेटी की तरह मानते हैं , और यह यात्रा पार्वती जी की विदाई के रूप में की जाती है |

नन्दा देवी की विदाई यात्रा के समय चार सींगों वाला बकरा (मेढ़ा) सबसे आगे चलता है | मान्यता है की जिस वर्ष यह यात्रा होनी होती है, उस वर्ष यह मेढ़ा(चार सींगों वाला बकरा) कहीं न कहीं अवश्य मिल जाता है |

नंदादेवी राजजात यात्रा  का समय

यात्रा के लिए निर्धारित तिथि नन्दाष्टमी है | इस दिन कांसुवा गाँव के कुंवर चार सींगों वाले मेढ़े (खाडू) तथा रिंगाल से बनी सुन्दर छंतोली लेकर नौटी मन्दिर पहुँचते हैं |

रिंगाल उत्तराखंड के रिंगाल को बौना बांस के नाम से भी जाना जाता है | यह बहुत उपयोगी पौधा है, जो  पर्यावरण में संतुलन बनाये रखता है, तथा भूस्खलन रोकने में भी सहायक है |

नौटी मन्दिर में छंतोली को नौटियालों को सौंप दिया जाता है | यहाँ पर चार सींगों वाले खाडू की पीठ पर ऊन से बने दो मुहे झोले में देवी की स्वर्ण प्रतिमा को आभूषण और भेंट से सजाकर रखा जाता है |

Nandadevi Raj jat Yatra Route

समुद्रतल से 13,200 फुट से लेकर 17,000 फुट की ऊँचाई तक पहुँचने वाली 280 किलोमीटर लम्बी यह पदयात्रा 19 पड़ावों से गुजरकर वाण गाँव (अंतिम गाँव) पहुँचती है |

चांदपुर गढ़ी के बाद तोप,भगोती,मींग तथा थराली होते हुए यह यात्रा नन्दकेसरी पहुँचती है | यह यात्रा का 10 वा पड़ाव है , यहाँ पर कुमाऊँ के लोग अपनी कुलदेवी की डोलियों के साथ इस यात्रा में सम्मिलित होते हैं |

नन्दकेसरी के बाद देवाल तथा मुन्देली होते हुए यह यात्रा अंतिम गाँव वाण गाँव पहुँचती है | यहाँ से लाटू देवता भी यात्रा में शामिल होते हैं | लाटू देवता को नन्दा देवी का भारवाहक माना जाता है | वाण गाँव पहुँचते - पहुँचते देवताओं और छंतलियों की संख्या लगभग 300 तक हो जाती है |

वाण गाँव के बाद राजजात यात्रा रण की धार होते हुए गैरोली पातर पहुँचती है, तथा यहाँ पर रात्रि में विश्राम होता है | अगले दिन यात्रा बेदनी कुण्ड पहुँचती है, यहाँ पर नन्दा देवी का एक मन्दिर है | इस मन्दिर में देवी की पूजा ब्रहमकमल से होती है | बेदनी कुण्ड बेदनी बुग्याल में स्थित है , जो कि मखमली घास वाला एक मैदान है, और प्रकृति का एक अनोखा रूप है |


बेदनी बुग्याल
बेदनी बुग्याल

बेदनी से लगभग 10 किलोमीटर दूर पाथर नाचनी है, जो कि पत्थरों का बना एक गोल घेरा है, इसके आगे महिलाएं यात्रा में शामिल नहीं होती हैं |

पाथर नाचनी के बाद कालु विनायक तथा भगवावासा होते हुए यह यात्रा 5835 मीटर की ऊँचाई पर स्थित रूपकुंड पहुँचती है |

रूपकुंड 5835 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह झील प्रकृति की नायाब देन है | रूपकुंड झील को नर कंकाल झील के नाम से भी जाना जाता है | इस झील में प्राचीन कई वर्षों से हजारों की मात्रा में नर कंकाल पड़े हुए है, और शोधकर्ता भी पता नहीं लगा पाए हैं कि ये नर कंकाल किसके हैं | यहाँ पर नरकंकालों का होना एक रहस्य है, इसलिए इस झील को रहस्यमयी झील के नाम से भी जाना जाता है |

रूपकुंड के बाद ज्योंरागली दर्रा पार करके राजजात यात्रा शिला समुद्र पहुँचती है | यह यात्रा का 16 वा पड़ाव है | शिला समुद्र के बाद बहुत ही कठिन रास्तों को पार करते हुए यह यात्रा अपने अंतिम पड़ाव (19 वा पड़ाव) होमकुण्ड पहुँचती है |

होमकुण्ड समुद्रतल से 4061 मीटर की ऊँचाई पर होमकुण्ड, त्रिशूली पर्वत की तलहटी में स्थित है |


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