` फूलदेई पर्व का इतिहास, जानिये उत्तराखंड में क्यों मनाया जाता है फूलदेई त्यौहार ?

फूलदेई पर्व का इतिहास, जानिये उत्तराखंड में क्यों मनाया जाता है फूलदेई त्यौहार ?

 उत्तराखंड राज्य को देवभूमि के नाम से जाना जाता है, और यह ऐसी पवित्र भूमि है, जहाँ पर ऋतुयों के अनुसार भी कई पर्व मनाये जाते हैं, जो सामाजिक तथा सांस्कृतिक कारकों के मिश्रण हैं | “उत्तराखंड सामान्य ज्ञान” की आज की पोस्ट में हम सदियों से चली आ रही प्रकृति को बचाने की मुहीम के बारे में जानेंगे, जिसे उत्तराखंड के लोग फूलदेई पर्व के रूप में मनाते हैं |

फूलदेई पर्व का इतिहास

फूलदेई पर्व का प्रकृति से सम्बन्ध

फूलदेई पर्व उत्तराखंड के प्रमुख त्योहारों में से एक त्यौहार है, तथा इसका सीधा सम्बन्ध प्रकृति से है | फूल संक्रांति के नाम से भी जाना जाने वाला फूलदेई का यह पर्व सदियों पूर्व से पर्यावरण को बचाने के लिए मनाया जाता है | यह एक मुहीम थी, जिसके माध्यम से पहाड़ों में पेंड-पौधे, नदियों तथा फूल-पत्तियों को बचाया जा सके, जिससे भविष्य में आगामी पीढ़ियों को प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली परेशानियों का सामना ना करना पड़े |

उत्तराखंड के फूलदेई त्यौहार को मानाने का उद्देश्य हमेशा से यही रहा है, कि इस त्यौहार के माध्यम से पेंड-पौधों, फूल-पत्तियों और नदियों से प्रेम करने की सीख दी जा सके | सदियों पूर्व पहले चलायी गयी यह मुहीम पीढ़ी दर पीढ़ी लोक गीतों के माध्यम से आगे बढ़ रही है |

चैत्र मास की संक्रांति अर्थात पहले दिन से ही बसंत आगमन की खुशी में मनाया जाने वाला उत्तराखंड का फूलदेई पर्व “रोग निवारक औषधि संरक्षण” दिवस के रूप में भी मनाया जाता है |

फूल संक्रांति को बसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक माना जाता है |

कैसे मनाया जाता है फूलदेई पर्व ?

फूल संक्रांति के पर्व को कहीं पर 8 दिनों तक तथा कहीं पर पूरे चैत्र माह तक मनाया जाता है | इस दिन बच्चे फ्योंली,बुरांश तथा अन्य रंग-बिरंगे फूलों को चुनकर इकट्ठा करते हैं, और घोघा माता की सजी हुई फूलकंडी में रख देते हैं |

घोघा माता की सजी फूलकंडी को लेकर बच्चे घर-घर जाते हैं, और घर की देहरी पर फूल डालते हैं, तथा सुख और समृद्धि के लिए सुभकामनाएँ देते हैं | महिलाओं द्वारा घर आये बच्चों की टोली का स्वागत किया जाता है, और उन्हें उपहार के रूप में चावल, गुड, पैसे इत्यादि दिए जाते हैं | अंतिम दिन बच्चे घोघा माता की बड़ी पूजा करते हैं, और इस अवधि के दौरान जितना भी चावल,दाल और भेंट राशि एकत्रित होती है, उसकी मदद से सामूहिक भोज पकाया जाता है, जिसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है |

घोघा माता को फूलों की देवी माना जाता है |

इस पर्व के मौके पर बच्चों के द्वारा लोक गीतों का गायन किया जाता है |

          फूल देई, छम्मा देई

          देणी द्वार, भर भकार

          ये देली स बारम्बार नमस्कार

          फूले द्वार ......फूल देई छम्मा देई

इस दिन फूलदेई से सम्बंधित अनेक लोकगीत गाये जाते हैं, जिनको गाने का अंदाज कुछ निराला ही होता है | होली के पर्व के बाद ही लोग इस दिन से ऋतुरैंण और चैती गायन में डूबने लगते हैं | ढोल, दमाऊ बजाने वाले लोग (बाजगी,औली तथा ढोली) घर-घर जाकर गीतों का गायन करते हैं, और इसके बदले घर के मुखिया द्वारा उन्हें भेंट के रूप में चावल तथा गुड देने की प्रथा है |

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