` Roopkund Lake/नरकंकाल झील – All Information in Hindi

Roopkund Lake/नरकंकाल झील – All Information in Hindi

About Roopkund Lake/Skeleton Lake/नरकंकाल झील

रूपकुंड झील (नरकंकाल झील) उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित बहुत ही सुन्दर हिम झील है जो की अपने किनारों पर प्राचीनकाल से पड़े नरकंकालों के पाए जाने के कारण प्रसिद्ध है | यहाँ पाए गए नरकंकाल किसके है तथा किस सदी के हैं इसकी पुष्टि न होने के कारण इसे “रहस्यमयी नरकंकाल झील” कहा जाता है | रूपकुंड झील की खोज सन 1942 में रेंजर एचके माधवल द्वारा की गयी थी |रूपकुंड में होने वाली “नन्दा राजजात यात्रा” विश्व प्रसिद्ध है |स्थानीय लोगों के साथ साथ इस यात्रा में देश के कई कोनो से आये लोग भाग लेते है तथा इस यात्रा का हिस्सा बनते हैं | यह धार्मिक यात्रा 12 वर्ष के अंतराल में होती है |समुद्रतल से इस झील की ऊँचाई लगभग 5029 मीटर है |

roopkund trek

यदि पर्यटन की दृष्टि से देखा जाए तो यह स्थान बहुत ही सुन्दर और रमणीक है | बेदनी बुग्याल और अली बुग्याल इस स्थान की सोभा बढ़ाते हैं | रूपकुंड झील त्रिशूल पर्वत और नन्दघुंगटी पर्वत चोटियों की तलहटी पर स्थित है | बेदनी बुग्याल और अली  बुग्याल हरी मखमली घास के मैदान हैं जो देखने में बहुत ही सुन्दर प्रतीत होते हैं |

वेदनी बुग्याल

 

रूपकुंड से जुडी कुछ प्रचलित बातें

  • रहस्यमयी नरकंकाल झील कही जाने वाली रूपकुंड झील में इतने अधिक मात्रा में नरकंकाल कहा से आये इस बारे में कई कहानिया प्रचलित हैं |
  • पहले माना जाता था कि जिनके कंकाल यहाँ पाए गए हैं वो किसी महामारी के शिकार हुए थे और उनके शव बर्फ में दबे रह गए थे |
  • इसके बाद कुछ वैज्ञानिकों के शोध के जरिये ये पता लगाया गया की ये कंकाल 12 वी से 15 वी सताब्दी के बीच के हैं और यह किसी महामारी की बजह से नहीं मरे थे |
  • कुछ बैज्ञानिको का कहना है  कि ये बर्फ के तूफ़ान में फस गए थे और ओलावृष्टि के समय सर पर चोट लगने से इनकी मौत हुई थी और बर्फ में इनके शव प्राकृतिक रूप से संरक्षित हो गए |
अली बुग्याल

 

History of Roopkund lake/ नरकंकाल झील का इतिहास

रूपकुंड झील की खोज सन 1942 में रेंजर एचके माधवल द्वारा की गयी थी | बैज्ञानिकों की शोध द्वारा पता चला है कि इस झील में पाए गए नर कंकाल 12 वीं से 15 वीं सताब्दी के हैं , किन्तु इस बात की पुष्टि अभी तक नहीं की गयी है | ये नरकंकाल अभी तक एक रहस्य बने हुए है इसलिए इस झील का दूसरा नाम "रहस्यमयी नरकंकाल झील" भी है|

जनश्रुति के अनुसार ये सारे कंकाल उस जापानी सेना के सैनिकों के है जो गुप्त रूप से भारत आये थे और इस स्थान पर फंस गए थे | जब इस बात की पुष्टि के लिए शोधकर्ताओं को वहां भेजा गया तो पता चला की यह कंकाल बहुत पुराने है  और जापानी सेना से इनका कोई लिंक नहीं है |वहां पर पड़े सभी कंकालों की DNA जाँच करायी गयी तो पता चला कि वहां पर 2 समूहों के शव है जिन सभी की मौत का कारण सर और कन्धों पर चोट लगने से हुई है  बतया गया|

रूपकुंड से जुडी स्थानीय मान्यता

  • जनश्रुति के अनुसार ये सभी कंकाल पुराने समय के एक राजा तथा उसकी प्रजा के हैं जो नन्दा राजजात यात्रा के लिए निकले थे |
  • बताया जाता है की यात्रा के समय राजा द्वारा की गयी गलतिओं की बजह से वहां पर आपदा के रूप में एक भयानक तूफ़ान आया था |
  • उस तूफ़ान में कई लोगों ने अपनी जान गवाई थी और उनके शव उसी स्थान पर बर्फ के नीचे दबे रह गए थे |
  • इस झील में चूड़ियाँ और गहने भी मिले हैं जिस से पता चलता है की इस यात्रा में महिलाओं ने भी भाग लिया था |

कैसे पहुचें रूपकुंड झील (How To Reach) ?

रूपकुंड झील पहुचने के लिए सर्वप्रथम आपको बाण गाँव पहुचना होगा | बाण गाँव तक मोटरमार्ग है | यहाँ पर अपने वाहन खड़े करके इसके आगे की यात्रा आपको पैदल करनी होती है |

roopkund trek

 

यहाँ पहुचने के लिए मुख्यतः निम्न मार्ग है –

  1. कर्णप्रयाग – थराली – देवाल - बाण  

  2. नंदप्रयाग – घाट – बाण

  3. ग्वालदम – देवाल – बाण

बाण गाँव से बेदनी बुग्याल होते हुए भगुवा वासा तक ट्रैकिंग:

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बाण गाँव से भगुआ वासा तक का ट्रैक बहुत ही सुन्दर तथा रोमांचक है | ट्रैकिंग के रास्ते पर चलते समय जंगल के बीच से निकलता हुआ रास्ता तथा रास्ते के दोनों तरफ बुरांश के पुष्प मन को आनंदित कर देते हैं |

  • सर्वप्रथम बाण गाँव से गैरोलीपाथर पहुचना होता है | गैरोलीपाथर में कुमाऊँ मंडल विकाश निगम द्वारा बनाये गए रेस्ट हाउस हैं ,जहा पर आप आराम कर सकते हैं |
  • गैरोलीपाथर के बाद आपको बेदनी बुग्याल पहुचना होता है |बेदनी बुग्याल इतनी खुबसूरत जगह है कि यहाँ की सुन्दरता को देखकर शरीर की सारी थकान दूर हो जाती है | यह हरी मखमली घास का एक बड़ा मैदान है |
  • बेदनी बुग्याल के बाद पाथरनाचनी होते हुए कालुविनायक पहुचना होता है | यदि आप यहाँ ठहराना चाहते है तो बेदनी बुग्याल और कालुविनायक में आप रूक सकते हैं |यहाँ पर जगह जगह पर आपको टेंट की सुविधा मिल जाती है |
  • कालुविनायक से भगुवा वासा तक का लगभग 5 किलोमीटर का ट्रेक थोडा कठिन है क्योंकि यहाँ पर अपना सामान लेकर कड़ी चढ़ाई चढ़नी पड़ती है |
  • भगुवा वासा से रूपकुंड झील मात्र कुछ ही दूरी पर है |

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