` नानकमत्ता साहिब गुरुद्वारा - इतिहास एवं मान्यताए

नानकमत्ता साहिब गुरुद्वारा - इतिहास एवं मान्यताए

नानकमत्ता साहिब गुरुद्वारा उत्तराखंड राज्य के उधम सिंह नगर जिले में नानकमत्ता क्षेत्र में सिक्खों का एतिहासिक पवित्र स्थल है जो सरयू नदी पर स्थित है | इस स्थान पर सिक्खों के प्रथम गुरु नानक देव जी तथा छठे गुरु हरगोविंद सिंह के पवित्र चरण पड़े थे | नानकमत्ता साहिब उत्तराखंड राज्य में सिक्खों के 3 पवित्र स्थानों में से एक है | राज्य में सिक्खों का दूसरा तथा तीसरा पवित्र स्थान हेमकुंड साहिब तथा रीठा साहिब हैं |

नानकमत्ता साहिब


मान्यता है कि सन 1515 में कैलाश पर्वत यात्रा के दौरान गुरुनानक देव ने नानकमत्ता का भ्रमण किया था| गुरूद्वारे (परिसर) में एक सरोवर है जहाँ पर श्रद्धालु स्नान करके खुद को पवित्र करते हैं, उसके बाद गुरूद्वारे के अन्दर जाते हैं |

नानकमत्ता सरोवर

गुरूद्वारे के अन्दर का शांत माहोल मन को शान्ति प्रदान करता है | दीपावली की अमावश्या पर यहाँ क्षेत्र का सबसे विशाल मेला लगता है | इस समय पर्तिदिन यहाँ पर लंगर का आयोजन होता है | यह मेला लगभग 1 माह तक चलता है |

नानकमत्ता साहिब गुरुद्वारा

गुरूद्वारे के पास में ही यहाँ पर एक सागर है जिसे नानक सागर के नाम से जाना जाता है | नानकमत्ता साहिब के नाम पर ही इस क्षेत्र का नाम नानकमत्ता पड़ा |

नानकमत्ता का इतिहास :

नानकमत्ता का पुराना नाम सिद्धमत्ता था | गुरुनानक देव जी ने तीसरी कैलाश यात्रा के समय यहाँ पर भ्रमण किया था | उनकी तीसरी कैलाश यात्रा को तीसरी उदासी भी कहा जाता है | कैलाश यात्रा के लिए नानक जी भाई मरदाना के साथं रीठा साहिब से निकले थे | नानकमत्ता साहिब में एक सूखा पीपल का पेंड था जिसके नीचे नानक देव आसन लिया करते थे |

जनश्रुति के अनुसार जैसे ही गुरुनानक जी के चरण यहाँ पर पड़े वैसे ही सूखा पेंड हरा भरा हो गया था | उस समय यहाँ के जंगल में गोरखनाथ के शिष्यों का निवास था, जो योगी कहलाते थे | एक बार योगियों ने अपनी योग शक्तियों द्वारा गुरुनानक जी को परेशान करने के लिए अपनी योग शक्तिओं द्वारा आंधी,तूफ़ान तथा भयानक बरसात करा दी ,जिससे पीपल का पेंड हवा में उड़ने लगा| पीपल के पेंड को हवा में उड़ता देख गुरुनानक जी ने अपना पंजा पेंड पर रख दिया और और पेंड उसी स्थिति पर रूक गया | आज भी पीपल की जड़ें 12 से 15 फीट ऊपर देखी जा सकती हैं | यही कारण है की नानकमत्ता साहिब आज के समय में पंजा साहिब के नाम से भी जाना जाता है |

ननकाना साहिब

बाबा मलमस्त के समय (जब वे सेवादार थे) योगियों के द्वारा पीपल के पेंड पर आग लगा दी गयी और इस धार्मिक स्थान पर कब्ज़ा करने का प्रयास किया गया था और कुछ हद तक वे सफल भी रहे थे, उन्होंने मलमस्त को वहां से भगा दिया था | इस बात की खबर सिक्खों के छटवें गुरु गोविन्द सिंह जी को पता चली तो वे यहाँ आ गए और यहाँ पर अपना अधिपत्य प्रारंभ किया | उन्होंने पीपल के पेंड पर केसर के छींटे मारकर  उसे पुन: हरा भरा कर दिया | आज भी पीपल के हरे पत्तों पर पीले रंग के धब्बे दिखाई देते हैं मानो उन पर केसर गिरा हुआ हो |

नानकमत्ता साहिब गुरूद्वारे में प्रसिद्द है दूध वाला कुआँ (मान्यता):

गुरूद्वारे परिसर में पानी का एक कुआँ है जो दूध वाला कुआँ के नाम से प्रसिद्ध है | स्थानीय लोगों के द्वारा इस कुवें में पहले दूध रहता था | मान्यता है की इस कुवें में नहाने से शरीर की सारी बीमारियाँ दूर हो जाती हैं |

बताया जाता है की यहाँ पर जो योगी निवास करते थे उनके पास बहुत सारी भैंसे थी जो बहुत दूध दिया करती थी | गुरु नानक देव जी ने जब भाई मरदाना के साथ यहाँ भ्रमण किया था तो भाई मरदाना भैंसे देखकर आश्चर्यचकित हो गए थे | एक बार भाई मरदाना ने वहां पहुच कर दूध पीने की इच्छा जताई और योगी के पास दूध मांगने पहुच गए , किन्तु योगियों ने भाई मरदाना को दूध देने से मना कर दिया क्योंकि वे नीची जाती के थे | गुरु नानक देव जी यह सब देख रहे थे , जब उन्होंने देखा की योगियों ने दूध देने से मना कर दिया है तो नानक देव जी ने अपनी अध्यात्मिक शक्तियों से सारी भैंसों का दूध खींच लिया और वहां पर स्थित एक कुवें में एकत्रित कर दिया | यह देखकर योगियों को एहसास हुआ की ये कोई भगवान् के भेजे हुए बन्दे हैं |

नानक साहिब गुरुद्वारा

योगियों ने नानक देव जी से छमा मांगी और सब कुछ साधारण कर देने के लिए प्रार्थना की | गुरु नानक देव जी ने योगियों को अपना दूध बापस लेने को कहा किन्तु वे जितना भी दूध कुवें से निकालते वह कुआँ पुन: भर जाता| तब से वह कुआँ दूध वाला कुआँ के नाम से जाना जाने लगा |

कैसे पहुचें नानकमत्ता साहिब गुरुद्वारा ? (google map)

उम्मीद करते हैं कि उत्तराखंड सामान्य ज्ञान की “नानकमत्ता साहिब” से सम्बंधित यह पोस्ट आपको पसंद आई होगी |

धन्यवाद

 

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